Tuesday, December 3, 2013

फितरत 

एक कतार में उड़ते पंछी हमे है  ये समझाये,
एक साथ चलो सब कंही कोई राह भटक न जाए
एक दूसरे को पीछे छोड़ने की चाह में
कंही किसी अपने का हाथ ही हम जल्दी में झटक न जाए

आकाश तो उन पंछियो के लिए भी असीमित है
पर वो अपनों की कद्र जानते है
अकेले को कभी भी कोई भी ताकतवर दबोच लेगा
वो ये सत्य पहचानते है  

एक इंसान है कि अपने स्वार्थो में डूबा हुआ
दूसरो की राह में कांटे बिछाता है
देखकर दूसरो को मुश्किल में
मन ही मन मुस्कराता है

पर  आता है जब अलविदा का समय
तब वो अपने कर्मो को करके याद बार बार पछताता है
तब उन ठुकराए हुए अपनों को ढूंढ़ती ही निगाहे उसकी
और वो उनकी एक झलक को भी तरस जाता है.… …    
एक झलक को भी तरस जाता है.

लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी  

Monday, October 21, 2013

नादान 

कौन कहता है की मै उदास हूँ
मै तो अब चुप चाप देखता हूँ क्योंकि
जमाने को अब मै  कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ

आँखे सब देखती है पर जुबान कुछ कहती नही
क्योंकि खामोश रहकर भी
आँखों से बहुत कुछ कहा जा सकता है
ख़ामोशी की जुबान मै कुछ कुछ जानने लगा  हूँ

इन धुंधले चेहरो के अक्स
कुछ इसतरह गडमड हो गये कि
 कोई चेहरा भी अब पहचान नही पाता
पर हर चेहरे के पीछे छुपे स्वार्थ को मै
कुछ कुछ खंगालने लगा हूँ

कितना नादान हूँ मै कि
इस कुछ कुछ जानने समझने में ही
 सारी जिन्दगी गंवा दी और
अब जब जिन्दगी की शाम हो गयी है
तो इस बात पर हँसू या रोऊँ  कि
जमाने को अब मै कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ   II

प्रवीन चन्द्र झांझी  

Tuesday, October 1, 2013

बुझ गया है दीप मन का फ़िर भी
जीवन के आँगन मे उम्मीद का दिया जलाया हुआ है
 अपनी उदासी की दीवार पर मुस्कान का दर्पण लगाया हुआ है
 किसी को क्या पता की इन मुस्कराते लबो के पीछे
हमने आंसुओ का एक सैलाब छुपाया हुआ है    

Thursday, August 29, 2013

कहानी 
ऐ दिले नादान है तू बदकिस्मत कितना की
लूटा तुझे जिसने सरे राह
उसीके पास रपट लिखवानी पडती है
है दिए जख्म जिसने तुझे
उसी से दवा लगवानी पडती है
साथ जीने मरने की कसमे, वो वादे, वो अहसास
वो सब अब  बे मायनी बाते   लगती  है
जब गुजर गयी रात
तो उस रात की हर बात पुरानी  लगती है
 मान ले ऐ मन मेरे की
कोई नही है कद्रदान तेरे अहसासों का
तेरी अब हर बात  बेकार कहानी लगती है II


प्रवीन चंद्र  झांझी 

Sunday, July 28, 2013

हमने दी सत्ता  तुमको ये समझकर कि
तुम समझोगे तकलीफे इन आम आदमी बेचारों के
हमे क्या पता था की तुम तो हो लंगड़े घोड़ो की रेस के घोड़े
तुम कद्र क्या जानो घुड़सवारो की 

Monday, July 8, 2013

शर्म

दाल महंगी, सब्जी महंगी, नमक महंगा,  चीनी महंगी,
बिजली महंगी, पानी महंगा , डीजल महंगा, पट्रोल महंगा
एफ डी आइ  बुलाये, मॉल बनवाये,
आम भारतीय को मालिक से नौकर बनवाये
 और जनता के हाथ में कटोरा थमाए
राशन की दुकानों में लाइन लगवाकर सस्ते अनाज की खैरात बटवाये
फिर भी चाहे की जनता तेरी जिंदाबाद के नारे लगाये? 
हाय रे हाय पर तुझ को शर्म न आये।

Sunday, July 7, 2013

बहाना

बहाना
कौन कहता है की आदमी मरने के बाद अकेला जाता है
सच तो ये है की इंसान हमेशा ही अकेला रहता है
रिश्ते नातो की इमारत जो वो जीवन भर बनाता है
उसकी नीव में एक एक ईट स्वार्थ और उमीदो की लगाता है
जब ढहता है वो मकान तो फिर वो समझ पाता है
जिसने फसाये रखा उसको इस माया जाल में उसी का नाम तो जमाना है
सच तो ये है कि उसने बनाया था एक ताश के पत्तो का महल
उसे तो एक दिन टूटना ही था, बस मौत तो एक बहाना है
और वो अकेला आया, हमेशा अकेला रहा और उसे अब अकेला ही जाना है


निवेदक:  प्रवीन चन्द्र झांझी