Monday, October 21, 2013

नादान 

कौन कहता है की मै उदास हूँ
मै तो अब चुप चाप देखता हूँ क्योंकि
जमाने को अब मै  कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ

आँखे सब देखती है पर जुबान कुछ कहती नही
क्योंकि खामोश रहकर भी
आँखों से बहुत कुछ कहा जा सकता है
ख़ामोशी की जुबान मै कुछ कुछ जानने लगा  हूँ

इन धुंधले चेहरो के अक्स
कुछ इसतरह गडमड हो गये कि
 कोई चेहरा भी अब पहचान नही पाता
पर हर चेहरे के पीछे छुपे स्वार्थ को मै
कुछ कुछ खंगालने लगा हूँ

कितना नादान हूँ मै कि
इस कुछ कुछ जानने समझने में ही
 सारी जिन्दगी गंवा दी और
अब जब जिन्दगी की शाम हो गयी है
तो इस बात पर हँसू या रोऊँ  कि
जमाने को अब मै कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ   II

प्रवीन चन्द्र झांझी  

Tuesday, October 1, 2013

बुझ गया है दीप मन का फ़िर भी
जीवन के आँगन मे उम्मीद का दिया जलाया हुआ है
 अपनी उदासी की दीवार पर मुस्कान का दर्पण लगाया हुआ है
 किसी को क्या पता की इन मुस्कराते लबो के पीछे
हमने आंसुओ का एक सैलाब छुपाया हुआ है