नादान
कौन कहता है की मै उदास हूँ
मै तो अब चुप चाप देखता हूँ क्योंकि
जमाने को अब मै कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ
आँखे सब देखती है पर जुबान कुछ कहती नही
क्योंकि खामोश रहकर भी
आँखों से बहुत कुछ कहा जा सकता है
ख़ामोशी की जुबान मै कुछ कुछ जानने लगा हूँ
इन धुंधले चेहरो के अक्स
कुछ इसतरह गडमड हो गये कि
कोई चेहरा भी अब पहचान नही पाता
पर हर चेहरे के पीछे छुपे स्वार्थ को मै
कुछ कुछ खंगालने लगा हूँ
कितना नादान हूँ मै कि
इस कुछ कुछ जानने समझने में ही
सारी जिन्दगी गंवा दी और
अब जब जिन्दगी की शाम हो गयी है
तो इस बात पर हँसू या रोऊँ कि
जमाने को अब मै कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ II
प्रवीन चन्द्र झांझी
कौन कहता है की मै उदास हूँ
मै तो अब चुप चाप देखता हूँ क्योंकि
जमाने को अब मै कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ
आँखे सब देखती है पर जुबान कुछ कहती नही
क्योंकि खामोश रहकर भी
आँखों से बहुत कुछ कहा जा सकता है
ख़ामोशी की जुबान मै कुछ कुछ जानने लगा हूँ
इन धुंधले चेहरो के अक्स
कुछ इसतरह गडमड हो गये कि
कोई चेहरा भी अब पहचान नही पाता
पर हर चेहरे के पीछे छुपे स्वार्थ को मै
कुछ कुछ खंगालने लगा हूँ
कितना नादान हूँ मै कि
इस कुछ कुछ जानने समझने में ही
सारी जिन्दगी गंवा दी और
अब जब जिन्दगी की शाम हो गयी है
तो इस बात पर हँसू या रोऊँ कि
जमाने को अब मै कुछ कुछ पहचानने लगा हूँ II
प्रवीन चन्द्र झांझी