Sunday, July 28, 2013

हमने दी सत्ता  तुमको ये समझकर कि
तुम समझोगे तकलीफे इन आम आदमी बेचारों के
हमे क्या पता था की तुम तो हो लंगड़े घोड़ो की रेस के घोड़े
तुम कद्र क्या जानो घुड़सवारो की 

Monday, July 8, 2013

शर्म

दाल महंगी, सब्जी महंगी, नमक महंगा,  चीनी महंगी,
बिजली महंगी, पानी महंगा , डीजल महंगा, पट्रोल महंगा
एफ डी आइ  बुलाये, मॉल बनवाये,
आम भारतीय को मालिक से नौकर बनवाये
 और जनता के हाथ में कटोरा थमाए
राशन की दुकानों में लाइन लगवाकर सस्ते अनाज की खैरात बटवाये
फिर भी चाहे की जनता तेरी जिंदाबाद के नारे लगाये? 
हाय रे हाय पर तुझ को शर्म न आये।

Sunday, July 7, 2013

बहाना

बहाना
कौन कहता है की आदमी मरने के बाद अकेला जाता है
सच तो ये है की इंसान हमेशा ही अकेला रहता है
रिश्ते नातो की इमारत जो वो जीवन भर बनाता है
उसकी नीव में एक एक ईट स्वार्थ और उमीदो की लगाता है
जब ढहता है वो मकान तो फिर वो समझ पाता है
जिसने फसाये रखा उसको इस माया जाल में उसी का नाम तो जमाना है
सच तो ये है कि उसने बनाया था एक ताश के पत्तो का महल
उसे तो एक दिन टूटना ही था, बस मौत तो एक बहाना है
और वो अकेला आया, हमेशा अकेला रहा और उसे अब अकेला ही जाना है


निवेदक:  प्रवीन चन्द्र झांझी