कहानी
ऐ दिले नादान है तू बदकिस्मत कितना की
लूटा तुझे जिसने सरे राह
उसीके पास रपट लिखवानी पडती है
है दिए जख्म जिसने तुझे
उसी से दवा लगवानी पडती है
साथ जीने मरने की कसमे, वो वादे, वो अहसास
वो सब अब बे मायनी बाते लगती है
जब गुजर गयी रात
तो उस रात की हर बात पुरानी लगती है
मान ले ऐ मन मेरे की
कोई नही है कद्रदान तेरे अहसासों का
तेरी अब हर बात बेकार कहानी लगती है II
प्रवीन चंद्र झांझी
ऐ दिले नादान है तू बदकिस्मत कितना की
लूटा तुझे जिसने सरे राह
उसीके पास रपट लिखवानी पडती है
है दिए जख्म जिसने तुझे
उसी से दवा लगवानी पडती है
साथ जीने मरने की कसमे, वो वादे, वो अहसास
वो सब अब बे मायनी बाते लगती है
जब गुजर गयी रात
तो उस रात की हर बात पुरानी लगती है
मान ले ऐ मन मेरे की
कोई नही है कद्रदान तेरे अहसासों का
तेरी अब हर बात बेकार कहानी लगती है II
प्रवीन चंद्र झांझी
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