Thursday, January 31, 2013


अंधे बहरो  की बस्ती 

अन्धो के इस शहर में दिया जलाने को मन नही करता
गूंगे - बहरो की इस बस्ती में आवाज भी लगाने को मन नही करता
कभी कभी मै बहुत अकेला हो जाता हूँ
इतना अकेला की हवा में उड़ने लगता हूँ
न कोई मुझे छु पाता है
न किसी के पास होने का एहसास मुझे हो पाता है
न अपने होने का एहसास मुझे रहता है
ये मन न कुछ सुनता है न कुछ कहता है
बस एक शून्य में ताकता रहता है
न कुछ खोता है न कुछ पाने को जी चाहता है
इस दुनिया की भीड़ को बस
 भागते हुए  ताकता सा रह जाता है
क्या खो गया है इनका और क्या खोज रहे है सब
ये सोच कर जी घबराता है
ये न पा सकने की कुंठा कंही इनके मन को भटका न जाए
यूं भागते-भागते थक कर कंही हारकर ये सो न जाए
जो कौमे थककर-हारकर सो जाती है
उनके आने वाली नसले सदा के लिए  अपनी पहचान खो जाती है
600 की देश की गुलामी को याद करके मन है डरता
मगर क्या करू जब देखता हूँ इन नेताओ की तरफ तो 

अन्धो के इस शहर में दिया जलाने को मन नही करता
गूंगे - बहरो की इस बस्ती में आवाज भी लगाने को मन नही करता

   

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