Sunday, December 2, 2012

                                                  वजह 

हर अनजान चेहरे में हर वक्त
कुछ जानी पहचानी सी लकीरे क्यों ढूँढता हूँ
जिन्दगी की भागम-भाग में छूट गये जो
उन जाने पहचाने चेहरो का पता
इन अनजान चेहरो  से क्यों पूछता हूँ,

जब मिटाए तो वो अक्स दिल के रेगिस्तान से
तो न सोचा था ये कि 
कुछ धुंधली सी बिखरी हुई अस्पष्ट लकीरे
दिल में बाकी खिची रह जाएगी,
जिन्दगी की शाम के धुंधलके में
उन अधमिटी लकीरों पर चलकर
उन अनजान राहों से अपनी खोई हुई
मंजिल का पता बेसाख्ता जाने क्यों पूछता हूँ,

ये न जानता था कि
कुछ सपने इस तरह टूट जाते है
जाग तो गया नींद से मगर
रात के उन हमसफर का पता
दिन के उजालो से न जाने क्यों पूछता हूँ,

नही जान पाता वो वजह
कि  जब हो ही गये वो अनजान हमसे
तो उस वसंत के फूलो की खुशबू
इन पतझड़ की झाड़ियो में क्यों सूंघता हूँ

हर अनजान चेहरे में हर वक्त
कुछ जानी पहचानी सी लकीरे क्यों ढूँढता हूँ ............I

लेखक :  प्रवीन चन्द्र झांझी

  

   


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